जबसे होश संभाला है 'भारत बंद' सुनता चला आ रहा हूँ| ये कार्यक्रम किसी नियमित दिनचर्या का हिस्सा लगने लगा है| इस 'भारत बंद' का मतलब क्या है? क्या भारत इतना मामूली है कि इसे कोई बंद करा सकता है!
और हमेशा भारत बंद ही क्यों होता है, कभी खुलता क्यों नहीं! मेरा तात्पर्य ये है कि अगर हम भारत को खोल नही सकते तो बंद करने वाले कौन होते हैं?

अगर आप इतने ही बंद-पसंद व्यक्ति हैं तो बेशक आप अपने घर में बंद हो जाइये पर दूसरे कि आज़ादी पर ग्रहण क्यों लगते हैं! ऐसे आयोजन आमतौर पर सृजनात्मक कम विध्वंसक ज्यादा होते हैं| इसकी बानगी २०-२१ फ़रवरी २०१३ को देखने को मिली जब हत्या से लेकर सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने तक सारे कुकर्म हुए|

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ये तस्वीर नोएडा कि हैं जहाँ युवाओं ने जमकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया| सवाल है अगर सचमुच पूरा भारत बंद था तो ये सब क्यों चालू था| इसे देख तो ऐसा ही लगता है कि भारत आर्थिक विषमता को दूर करने के लिये एक नयी राह पे चल पड़ा है - अगर आप खुद की ऑडी या मर्सडीज़ नहीं खरीद सकते तो दूसरों कि में आग लगा दीजिए | ये बेहद खतरनाक और दुर्भाग्यपूर्ण है|

अपनी मांगों के लिये हड़ताल आदि का सहारा लेना गलत नहीं है मगर इस प्रकार के नुकसान की जिम्मेदारी, बंद का आग्रह करने वाले संगठन को लेनी होगी जैसा कि सुप्रीम कोर्ट का २००३ में दिया गया एक निर्णय भी कहता है|